श्रीमति गायत्री देवी-प्रथम महिला अध्यापिका
Posted on 31-08-2023 12:29 PM
                                                                                   श्रीमति गायत्री देवी

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आज से 100 साल पहले नगर में लड़कियों को पढ़ाने के बारे में अभिभावकों के क्या विचार रहे होंगे।किस तरह की परिस्थितियों रही होगी। वो लड़कियां मन मसोस कर रह जाती थी जो पढ़ने की उत्कण्ठ इच्छा रखती थी लेकिन साधन नहीं होते थे।सामाजिक परिस्थितियों अनुकूल नहीं थी।ऐसे में यदि कोई अपने बच्चों को विशेष कर लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें तो इससे आप कल्पना कर सकते हैं कि वह अभिभावक अपने समय से कितने आगे की सोच रखते होंगे।

इस बारे में जब मण्डीपीडिया ने खोज खबर की तो पता चला कि महामृत्युंजय मंदिर के सामने थनेहड़ा मुहल्ला में नीलकंठ महादेव के बाईं और स्थित एक दो मंजिला घर है जहां वर्ष 1905 में  गिरधारी लाल व माता दुर्गी देवी के घर गायत्री बालिका का जन्म हुआ। जिनका भाई मुरारी लाल वन विभाग में फॉरेस्ट रेंजर के पद पर कार्यरत रहा।

चौहटा बाजार में द्विवेदी क्लॉथ हाउस के बगल में एक छोटा सा रास्ता अंदर को जाता है जहां एक खुला आंगन है और एक बहुत बड़ी चौकी हुआ करती थी जो पंडितों के परिवार में बहुत ही प्रतिष्ठित परिवार माना जाता था। आज से 60 वर्ष पूर्व इस घर को 'चौहटे रे पंडित' या 'लालू पंडता रा घर' कहकर संबोधित किया जाता था। इसी घर में गायत्री देवी की शादी मण्डी के प्रसिद्ध बैद दुर्गा दत्त जी के साथ संपन्न हुई। गायत्री देवी की सास अष्टमु देवी भी अपने समय की प्रतिष्ठित महिला थी जिनका 110 वर्ष की आयु में साल 1977 में देहांत हुआ था।ससुर चेतराम का भी समाज में बड़ा रुतबा था।गायत्री देवी के पति दुर्गा दत्त बहुत ही मशहूर वैद थे और उनका काफी नाम था तथा आसपास के गांव के लोग उनके पास अपना इलाज कराने आते थे और वह भी गांव गांव जाकर मरीजों को देखते थे। गायत्री देवी की तीन लड़कियां क्रमशः दुर्गा देवी(नाथी भैंजी)जया शर्मा(जया भैंजी) एवं दिनेश शर्मा हुई।

 गायत्री जी की सब से छोटी बेटी दिनेश शर्मा अपनी माता जी के बारे में पुरानी बातें करते-करते यादों में खो जाती हैं और बताती हैं की माता जी लाहौर के अपने अनुभव सुनती थी और कहती थी कि लाहौर में जब लड़कियां हॉस्टल में रहती थी तो  कभी-कभी लाहौर के बाजार में जाकर खरीदारी करने जाना होता था तो उन्हें 3 मीटर की चादर ओढ़ने के लिए दी जाती थी। पर्दा प्रथा थी और टीचर मुसलमान होता था। उस समय लाहौर के लेडिज बाजार में शॉपिंग करने जा पाती थी।मेधावी होने के कारण इन्हें छात्रवृत्ति भी मिलती रही।

गायत्री देवी 2 साल लाहौर में पढ़कर वहां से मैट्रिक पास की तत्पश्चात 2 साल लुधियाना में जेबीटी-एसबी का कोर्स किया।रानी अमृत कौर स्कूल में गायत्री देवी की प्रथम नियुक्ति बतौर अध्यापिका हुई।सीनियर होने के नाते बहुत ही प्रसिद्ध तथा सख्त किस्म की शिक्षिका के रूप में मशहूर थी।

उनकी सास अष्टमु देवी के पास राजा जोगिंदर सेन एक बार स्वयं मिलने आए थे और उन्हें चादर भी भेंट की थी।

इन्हें मण्डी नगर की प्रथम टीचर होने का गौरव भी प्राप्त है।स्कूल में हिस्ट्री, ज्योग्राफी, मैथ व हाइजीन पढ़ाती थी। इसी      स्कूल में ही अपनी सेवाएं देती रही जहां से वह वर्ष 1960 में सेवानिवृत हुई थी।  गायत्री देवी जी ने सेवानिवृत होने के बाद बतौर  हेड टीचर आर्य समाज स्कूल मण्डी में भी अपनी सेवाएं दी थी। रानी अमृत कौर कन्या पाठशाला में पढ़ी कई भूतपूर्व छात्राएं अभी भी उन्हें आदर सहित याद करती हैं।मण्डी नगर के कई परिवारों की तीन पीढियों तक को विभिन्न अंतराल पर इसी स्कूल में पढ़ाया था।

गायत्री देवी बतौर अध्यापिका मंडी नगर में बहुत प्रसिद्ध हो चुकी थी और यह बात राज दरबार तक भी पहुंची।मण्डी राजा जोगिंदर सेन की दूसरी पत्नी रानी कुसुम कुमारी ब्याह कर जब मण्डी आई तो उन्हें मंडी की जीवन शैली, खान पान व संस्कृति,रीति रिवाज, मंड्याली भाषा इत्यादि के बारे में जाने की उत्कंठ इच्छा हुई तो  गायत्री देवी को मण्डी की रानी साहिबा को आवश्यक जानकारी देने के लिए न्योता आया। जोकि इस पंडित परिवार के लिए बहुत बड़ा सम्मान था।

राज परिवार की कार  शाम के समय उन्हें लेने आती थी।रानी कुसुम कुमारी को गायत्री देवी ने मण्डी नगर से संबंधित कई विषयों के बारे में बताया और उनका रात्रि भोजन रानी कुसुम कुमारी के साथ ही होता था और वही कार उन्हें घर तक छोड़ने आती थी।ज्ञात रहे की मण्डी के सिनेमा हॉल का नाम 'कुसुम थियेटर' भी रानी कुसुम कुमारी के नाम पर ही रखा गया था।

दादी नानी की  उम्र की भूतपूर्व छात्राओं के अनुभवः

प्रसिद्ध मण्डयाली कवयित्री व शिक्षाविद लीला हाण्डा जी अपनी मैडम के बारे में अनुभव यूं ब्यां करती हैं क,"  मै भी उनसे छठी, सांतवीं कक्षा में इतिहास, भूगोल पढ़ा है। बहुत रौबदार कड़क थी । लड़कियों दुपटे के बगैर उन्हें बरदाश्त नहीं होता।वह दुुपटे को मंडयाली मे घुंडू कहा करती थी।नंगा सिर बरदाश्त नहीं ।मैने दो बार अपनी बहन और अम्मा का दुपटा स्कूल में भूलने के कारण थप्पड़ का स्वाद चखा था जो अभी भी याद है।"

कृष्णा टाकीज के मालिक दिवंगत श्री रमेश चन्द्र जी की सुपुत्री मीना भल्ला ने भी अपनी टीचर को याद करते हुए बताया कि,"हमें भी पढ़ाया है गायत्री बहनजी ने। मुझे अभी भी याद है मैं छठ्ठी कक्षा में थी। मेरे पिता जी ने मेरे लिए एक मफलर लाकर दिया था, जिसे मैं स्कूल में पहन कर गई थी।मुझे उनसे मिली झिड़कियां अभी भी याद है। मुझे कहा,"पम्मा री मठ्ठीए (मेरी मां का नाम),ये चित्थडू किद्धियो लपेटि रा? काड़ा जेहे धोरा धबट्टा (दुपट्टा)पेन्ही के आयां नईं ता क्लासा ते बाहर निक्खड़ी जायां।" वो अनुशासन के प्रति समर्पित थी। आज तक याद है।गायत्री बहनजी,बरू बहनजी व तुरु बहनजी।वो कभी न भूलने वाले दिन थे।"


आशा हाण्डा जी ने भी अपनी टीचर को याद करते हुए बताया कि, "मैं वर्ष 1959 में छठ्ठी कक्षा में पढ़ती थी और वह(गायत्री मेैडम) मेरी क्लास टीचर थी।मैं कक्षा 6th-A की क्लास मॉनिटर थी।वह मुझे मेरी माँ कमल काँता के नाम से पुकारती थी "

मण्डी की प्रथम महिला शिक्षिका होने के नाते मण्डीपीडिया परम श्रद्धेय गायत्री देवी जी को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।विनोद बहल/मण्डीपीडिया/2023

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Naveen Kumar Behl
13-09-2023 07:11 PM
Very nicely written and enriching.
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