हमारी संस्कृति में जल प्रदूषण:
-विनोद बहल

पवित्र नदियों में स्नान, जल को देवता जैसा अधिमान देना और प्रत्येक धार्मिक कर्मकांड शुद्ध व पवित्र जल के बिना पूर्ण नहीं होता।ऐसी पृष्ठभूमि में नदियों व जल स्रोतों का प्रदूषित होना हमारी सोच व हमारे संस्कारों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देता है। सदियों से स्थापित व पूजनीय तथा हमारे डीएनए में रची बसी देव संस्कृति में हम ऐसा क्यों करते आ रहे हैं, यह अभी भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है। गहनता से सोच कर हमें व्यक्तिगत स्तर पर समाधान खोजने होंगे तभी हम इस पर्यावरण के सामाजिक कर्ज से मुक्त हो पाएंगे।
मण्डयाली में ब्यासा विपाशा के नाम से बहुत ही मधुर गीत ब्यास नदी की व्यथा पर बनाया गया है इसमें प्रत्येक शब्द आप यदि ध्यान से सुनेंगे तो पाएंगे कि हम अपनी प्यारी जीवनदायिनी नदी को कितना चाहते हैं और हम इसके साथ कितनी क्रूरता कर रहे हैं।
गीतकार: विनोद बहल
संगीतकार:उमेश भारद्वाज गायक:ओल्ड ब्वायज बैण्ड