करुण गाथा: सती प्रथा के नाम पर जिंदा जला दी गईं मंडी राजमहल की 252 औरतें, बरसेलों में दफन है अनसुनी दर्द की दास्तां
विनोद भावुक। मंडी
मंडी रियासत के राजा की मौत होने पर उनकी रनियों, ख्वासों और रखैलों को जिंदा जला दिया जाता था। 1637 से लेकर बाद के वर्षों में मंडी के राजाओं के साथ 252 महिलाएं जिंदा जला दी गईं। मंडी रियासत में सती होने का सबसे पुराना मामला 1664 में दर्ज हुआ, जब राजा सूरज सेन की रानी अपने पति के साथ सती हो गई थी।
1679 में जब राजा श्याम सेन की मौत हुई तो उसके साथ उनकी 5 रानियां, दो ख्बासें और 87 रखैलें सती हुईं थीं। अलेग्जेंडर कनिंघम के पुरातात्विक सर्वेक्षण के अनुसार 1637 से लेकर बाद के वर्षों में मंडी के राजाओं के साथ कुल 252 महिलाएं जिंदा जला दी गईं। 1820 में मंडी आए विलियम मूरक्राफ्ट ने भी सती पत्थरों का वर्णन किया है।
हर सती की याद में बरसेला
जर्नल ऑफ सोशल साइंसेस में प्रकाशित डॉ. संदीप सिंह राघव और कुलदीप सिंह के शोध पत्र के अनुसार, मंडी में सती हुई महिलाओं की याद में जो स्मारक पत्थर बनाए गए, उन्हें स्थानीय भाषा में बरसेले कहा जाता है। मंडी शहर में सुकेती नाले के बाएं किनारे पर ऐसे कई स्मारक पत्थर आज भी मौजूद हैं, जिसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया है।

2006 में सरकाघाट तहसील के बलद्वाड़ा क्षेत्र के सुखर गांव में किसान मुंशी राम की जमीन से भी कुछ बरसीले निकले थे। यह क्षेत्र कभी हटली के राणाओं के अधीन था और पास में कमलाह किला भी स्थित है । इससे पता चलता है कि यह प्रथा शासक वर्ग में व्याप्त थी। शोध पत्र में इस क्रूर परंपरा का विस्तार से वर्णन किया गया है।
विग्ने ने देखा सती होने का सीन
इतिहासकार जे. हचिसन और जॉन फिलिप वोगल ने 'हिस्ट्री ऑफ द पंजाब हिल स्टेट्स' में एक अंग्रेज यात्री विग्ने का वर्णन किया है, जिन्होंने 1839 के आसपास मंडी में एक महिला को सती होते देखा था। विग्ने ने लिखा कि एक विधवा अपने मृत पति की चिता पर जलने के लिए जा रही थी। उसे भांग और अफीम देकर बेहोश किया गया था।
यात्री विग्ने ने लिखा है कि दो ब्राह्मण महिला को सहारा देकर ले जा रहे थे और भीड़ जगन्नाथ के नाम का जाप कर रही थी। आधे घंटे में चिता तैयार की गई और उसे मृत पति के साथ जला दिया गया। यह शोध मंडी क्षेत्र में सती प्रथा के इतिहास, उससे जुड़ी मान्यताओं और उसके प्रभाव को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
सराड़-रा-धार, तिक्कर का मेला, भानू का झेरा
मंडी जिले में ‘सराड़-रा-धार’ नामक पहाड़ी पर सौ साल पहले शौनी देवी अपने पति लीरू राम की चिता में सती हो गई थी। आज भी लोग इस स्थान से गुजरते समय यहाँ हरी पत्तियां रखकर उस आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। मंडी जनपद की लोकगाथा 'भानू का झेरा' में सती प्रथा का मार्मिक वर्णन मिलता है, जिसे सुन आंखें नाम हो जाती हैं।
राजा ईश्वरी सेन के समय मंडी में चेचक की महामारी फैली। राजा के आदेश पर नदौन से डॉक्टर और टीकाकरण दल बुलाए गए। मंत्री दुग्गल के पुत्र भानू ने टीका लगवाने से मना कर दिया और चेचक से उसकी मृत्यु हो गई। उसकी दोनों पत्नियां उसकी चिता में सती हो गईं। आज भी हर साल लगने वाले मेले में लोग उन्हें याद करते हैं।
सती स्थलों पर पत्थर फेंकने की परंपरा
मंडी क्षेत्र के कई गांवों में आज भी उन स्थानों पर पत्थर फेंकने की परंपरा है, जहां कभी कोई महिला सती हुई थीं। गुरकोठा के पास ‘सतिया-रा-गलू’, टांडा के पास ‘सतिया-रा-पीपल’ और चौंतड़ा के पास तरामट में आज भी लोग सती स्थलों पर पत्थर रखते हैं। मान्यता है कि सती होने से पहले उस महिला ने उस स्थान पर एक पत्थर रखा था। लोग उसकी आत्मा की शांति के लिए ऐसा करते हैं।
सती प्रथा रियासत्कालीन सामाजिक व्यवस्था का वह काला अध्याय है जहां महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति समझा जाता था। गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक ने 1829 में इस प्रथा को अवैध घोषित कर दिया था, लेकिन मंडी में यह 1846 तक जारी रही। यह शोध पत्र मंडी क्षेत्र में सती प्रथा के इतिहास, उससे जुड़ी मान्यताओं और उसके प्रभाव को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
साभार: Himachal Business