धार्मिक अनुष्ठान का 'पड़ता'
Posted on 29-05-2026 08:13 AM

धार्मिक अनुष्ठानों का 'पड़ता'- मण्ड्याली परंपरा और पं. अक्षरी दत्त शर्मा : लोकभाषा में जीवित वैदिक संस्कृति का अद्भुत दस्तावेज।                                       

                                       -विनोद बहल

मण्डी क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में “पड़ता” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः बाहर के लोग इसे केवल कोई बोली जाने वाली पद्धति या मंत्रोच्चारण समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में मण्डी की लोकपरंपरा में “पड़ता” का अर्थ उन वस्तुओं, सामग्रियों और अनुष्ठानिक उपकरणों से होता है जो किसी धार्मिक कर्मकांड में प्रयुक्त होते हैं।

अर्थात विवाह, श्राद्ध, पूजन, यज्ञ, नामकरण, जनेऊ अथवा अन्य संस्कारों में जो सामग्री आवश्यक होती है — जैसे धूप, दीप, चावल, दूब, रोली, कलश, कपड़ा, सुपारी, तिल, घी, पात्र, फूल, नैवेद्य आदि — उनके सामूहिक विवरण और क्रमवार उल्लेख को स्थानीय मण्डयाली बोली में “पड़ता” कहा जाता है।

रियासत कालीन समय से मण्डी में जब भी कोई धार्मिक अनुष्ठान होता आ रहा है ,उसमें पुरोहित संस्कृत में वैदिक मंत्र पढ़ते हैं, लेकिन साथ ही अनुष्ठान में उपयोग होने वाली सामग्री और उसकी आवश्यकता का वर्णन मण्ड्याली भाषा में किया जाता है, ताकि घर-परिवार और उपस्थित जनसाधारण पूरी प्रक्रिया को समझ सकें। 

उदाहरण के रूप में यदि विवाह संस्कार हो रहा हो, तो उसमें कौन-कौन सी सामग्री लगेगी, किस समय कौन-सी वस्तु आगे करनी है, किस रस्म में कौन-सा पात्र चाहिए — इन सभी का लोकभाषा में जो क्रमवार वर्णन किया जाता है, वही “पड़ता” है और इससे सभी मण्डी वासी भलीभाँति परिचित हैं। 

 इसलिए मंडी की परंपरा में “पड़ता” केवल शब्द नहीं, बल्कि एक संपूर्ण अनुष्ठानिक व्यवस्था का लोकभाषिक स्वरूप था।

विशेष बात यह थी कि यह ज्ञान केवल पंडितों तक सीमित नहीं था। मण्डी समाज की बुजुर्ग महिलाएँ भी “पड़ता” की अद्भुत ज्ञाता होती थीं। वे भले औपचारिक रूप से शिक्षित न हों, लेकिन उन्हें विभिन्न संस्कारों में प्रयुक्त सामग्री का क्रम, नाम और उपयोग पूरी तरह याद रहता था।

घरों में जब विवाह या श्राद्ध जैसे बड़े संस्कार होते थे, तब ऐसी अनुभवी महिलाओं को विशेष रूप से बुलाया जाता था। उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा इसलिए थी क्योंकि वे बिना किसी लिखित सूची के सहज रूप से बता देती थीं कि कौन-सी वस्तु कब लगेगी और कौन-सी रस्म में क्या आवश्यक होगा। यह मण्डी की सामुदायिक स्मृति और मौखिक ज्ञान परंपरा का अद्भुत उदाहरण है।

लेखक के मन में लंबे समय तक यह जिज्ञासा बनी रही कि इतनी विस्तृत और व्यवस्थित “पड़ता” परंपरा केवल मौखिक रूप में ही कैसे जीवित रही होगी। अवश्य ही किसी समय किसी विद्वान ने इसे लिपिबद्ध किया होगा। इसी खोज के दौरान मण्डी के भगवाहन मोहल्ला निवासी राजमान्य पुरोहित एवं पौराणिक कथावाचक पंडित अक्षरी दत्त शर्मा जी द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण पुस्तकें सामने आती हैं।

इन पुस्तकों में विवाह, श्राद्ध, पूजन और अन्य संस्कारों में प्रयुक्त “पड़ता” को ठेठ मण्डयाली शैली में संकलित किया गया है। उपलब्ध पुस्तकों में “विवाह पद्धति”, “श्राद्ध दर्पण”, “पूजन चन्द्रिका” और “संस्कार पद्धति” जैसी पुस्तकें विशेष उल्लेखनीय हैं।

इन ग्रंथों का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि भाषायी और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत बड़ा है। ये पुस्तकें सिद्ध करती हैं कि मण्ड्याली बोली केवल बोलचाल की भाषा नहीं थी, बल्कि वह धार्मिक व्यवहार, सामाजिक संगठन और लोकस्मृति की भी समर्थ भाषा रही है।

विशेष रूप से यह कार्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने एक ऐसी मौखिक परंपरा को लिखित रूप दिया, जो अन्यथा समय के साथ विलुप्त हो सकती थी। इन पुस्तकों में केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि मंडी समाज की सांस्कृतिक संरचना, लोकभाषा की आत्मीयता और सामुदायिक जीवन की झलक भी दिखाई देती है।

आज जब आधुनिक जीवनशैली के कारण संयुक्त परिवार और पारंपरिक ज्ञान-श्रृंखलाएँ कमजोर होती जा रही हैं, तब “पड़ता” जैसी परंपराएँ भी धीरे-धीरे स्मृति से ओझल हो रही हैं। नई पीढ़ी शायद यह भी न जानती हो कि “पड़ता” शब्द का वास्तविक अर्थ क्या था और इसका मण्डी समाज में कितना व्यापक महत्व था।

ऐसे समय में पं. अक्षरी दत्त शर्मा जैसे विद्वानों का कार्य केवल साहित्यिक योगदान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का ऐतिहासिक प्रयास है। आवश्यकता इस बात की है कि इन पुस्तकों का डिजिटलीकरण, शोध और पुनर्प्रकाशन हो, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ मंडी की इस अनूठी लोक-वैदिक परंपरा को समझ सकें।

 “पड़ता” परंपरा के अर्थ, स्वरूप और धार्मिक-सामाजिक उपयोग को समझने के उद्देश्य से जब मैंने खोजबीन प्रारम्भ की, तब इस कार्य में सबसे महत्वपूर्ण सहयोग मेरे कूल पुरोहित स्वर्गीय दीनू पुरोहित जी के परिवार से प्राप्त हुआ। 

उनके निधन के पश्चात यह पुरोहित परंपरा उनके सुपुत्र श्री देवेंद्र पाल (पाल पुरोहित) जी द्वारा आगे बढ़ाई जा रही है, वर्तमान में उनके पुत्र भी इस परंपरा से जुड़े हुए हैं। उनका निवास मण्डी नगर के चबाटा क्षेत्र में है, जहाँ ऐतिहासिक बगलामुखी मंदिर भी स्थित है। 

जब मैंने “पड़ता” शब्द और उससे संबंधित धार्मिक सामग्री के अर्थ एवं परंपरा को समझने के लिए देवेंद्र पाल जी से संपर्क किया, तब उन्होंने बताया कि उनके पास पिताजी के समय से एक प्राचीन पुस्तक सुरक्षित है। यद्यपि उस पुस्तक के प्रारंभिक बारह पृष्ठ, जो विवाह-पद्धति से संबंधित थे, फटे हुए थे, फिर भी सौभाग्यवश “पड़ता” से संबंधित अध्याय सुरक्षित मिले। यह मेरे शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री सिद्ध हुई।

इसी पुस्तक से यह जानकारी प्राप्त हुई कि इसके रचयिता भगवाहन मोहल्ला निवासी पंडित अक्षरी दत्त जी थे। इसके बाद मैंने श्री उमेश भारद्वाज जी के माध्यम से उस परिवार से संपर्क स्थापित किया। बातचीत में ज्ञात हुआ कि पंडित अक्षरीदत जी के पौत्र श्री उमेश मुदगील शिमला में एक विद्यालय में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क करने पर उन्होंने बताया कि उनके दादाजी ने कुल चार पुस्तकें लिखी थीं, किन्तु उनका पुनर्मुद्रण संभव नहीं हो पाया। उन्होंने उन पुस्तकों के मुखपृष्ठों की प्रतियां तथा पंडित अक्षरी दत जी का दुर्लभ छायाचित्र भी उपलब्ध करवाया।

इस सम्पूर्ण प्रक्रिया ने यह स्पष्ट किया कि मंडयाली संस्कृति, लोकभाषा और धार्मिक परंपराओं का वास्तविक ज्ञान केवल लिखित इतिहास में ही नहीं, बल्कि नगर के प्रोहित परिवारों, मौखिक परंपराओं और निजी संग्रहों में भी सुरक्षित है। “पड़ता” जैसी परंपराओं का अध्ययन केवल शब्दार्थ की खोज नहीं, बल्कि मंडी नगर की सामाजिक-सांस्कृतिक स्मृति को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

यह सूचना और अनुभव मैं इस पोस्ट के माध्यम से शोधकर्ताओं और संस्कृति-प्रेमियों के साथ साझा करना अपना सौभाग्य मानता हूँ।सरदार पटेल विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग द्वारा नगर की विवाह पद्धति पर शोध हो रहा है। आशा है कि यह जानकारी शोद्धार्थियों के लिए काम आएगी। 

(इसी आलेख के आधार पर माण्डव्य टाइम्स में नीचे समाचार छपा है) 


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06-08-2026 02:12 AM
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06-08-2026 02:13 AM
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